मोहिनी एकादशी
मोहिनी एकादशी सनातन परंपरा में भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली एकादशी मानी जाती है। वर्ष 2026 में मोहिनी एकादशी सोमवार, 27 अप्रैल को मनाई जाएगी। नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 26 अप्रैल 2026 की संध्या से आरंभ होकर 27 अप्रैल 2026 की संध्या तक रहेगी। यह वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है और वैष्णव परंपरा में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
मोहिनी एकादशी का नाम सुनते ही भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की स्मृति जागती है। “मोहिनी” शब्द केवल आकर्षण का संकेत नहीं देता, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि ईश्वर माया के पार ले जाने की शक्ति रखते हैं। परंपरागत व्रत-कथा में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत मनुष्य के पापों और क्लेशों का नाश करने वाला है तथा उसे मोह के जाल से मुक्त करने वाला माना गया है। इसी कारण इसे केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, इंद्रिय-निग्रह, भक्ति और अंतर्मंथन का विशेष अवसर माना जाता है।
आज के समय में जब जीवन व्यस्तता, तनाव, आकर्षण, असंतुलन और मानसिक उलझनों से घिरा हुआ है, तब मोहिनी एकादशी का संदेश और भी गहरा हो जाता है। यह हमें सिखाती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर से पहले भीतर है—मोह, भ्रम, लालच, असंतोष, क्रोध और अस्थिरता से। इस दृष्टि से मोहिनी एकादशी केवल धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अवसर है, जो मन को भगवान की ओर मोड़ने और जीवन को सात्विक बनाने की प्रेरणा देती है।
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Toggleमोहिनी एकादशी 2026 कब है
वर्ष 2026 में मोहिनी एकादशी 27 अप्रैल, सोमवार को मनाई जाएगी। नई दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 26 अप्रैल की शाम को आरंभ होकर 27 अप्रैल की शाम तक रहेगी। कुछ स्रोतों में समयों में लघु अंतर दिखाई दे सकता है, जो पंचांग-पद्धति, स्थान और गणना-पद्धति के कारण सामान्य है; परंतु 27 अप्रैल 2026 को मोहिनी एकादशी मनाए जाने पर प्रमुख धार्मिक स्रोत सहमत हैं।
यह तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है। वैशाख मास स्वयं दान, स्नान, जप, व्रत और विष्णु-भक्ति के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। ऐसे में वैशाख शुक्ल एकादशी का महत्व और भी अधिक हो जाता है। यही कारण है कि अनेक भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, तुलसी अर्पित करते हैं, कथा सुनते हैं और रात्रि में भी हरिनाम-स्मरण में लगे रहते हैं।
मोहिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
मोहिनी एकादशी का सबसे बड़ा महत्व यह माना जाता है कि यह मनुष्य को पाप, क्लेश और मोह से दूर करने वाली एकादशी है। व्रत-कथा में महर्षि वशिष्ठ द्वारा श्रीराम को बताया गया है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की यह एकादशी अत्यंत शुभ है और इसके प्रभाव से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। कथा यह भी कहती है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति मोह के जाल से मुक्त हो सकता है। यही इस एकादशी का मूल तत्व है—मोह से मोक्ष की दिशा।
एकादशी व्रतों का सामान्य महत्व भी बहुत ऊँचा माना गया है। धार्मिक परंपरा में प्रत्येक मास में दो एकादशी आती हैं—एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में—और ये भगवान विष्णु के भक्तों द्वारा बड़े उत्साह से मनाई जाती हैं। मोहिनी एकादशी इस व्यापक एकादशी-परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन इसकी विशिष्टता यह है कि इसे मोह-नाशक और चित्त-शुद्धिकारक माना गया है।
मोहिनी एकादशी का महत्व केवल पाप-क्षालन तक सीमित नहीं है। यह दिन यह भी याद दिलाता है कि मनुष्य को अपने भीतर के भ्रमों पर विजय पानी चाहिए। कई बार जीवन में समस्या केवल बाहरी नहीं होती, बल्कि हमारी इच्छाओं, अपेक्षाओं, आकर्षणों और अस्थिर भावनाओं से पैदा होती है। इस अर्थ में मोहिनी एकादशी एक गहरा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक उत्सव भी है। यह संयम के माध्यम से मन को स्पष्ट करने का दिवस है।

“मोहिनी” नाम का भाव
भगवान विष्णु का मोहिनी रूप पुराणिक परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है। यह रूप उस दिव्य शक्ति का प्रतीक है जो संसार के जटिल संघर्षों के बीच संतुलन स्थापित करती है। धर्मग्रंथों और पारंपरिक व्याख्याओं में मोहिनी रूप को ईश्वर की अद्भुत लीला के रूप में देखा जाता है—जहाँ वे अपनी योगमाया के द्वारा धर्म की रक्षा करते हैं और देवताओं के हित की व्यवस्था करते हैं। मोहिनी एकादशी उसी स्मृति को लेकर आती है, लेकिन इसका आंतरिक अर्थ और भी सुंदर है: जो मनुष्य मोह में फँसा है, उसे भगवान विष्णु ही सच्चे विवेक की ओर ले जा सकते हैं।
यहाँ “मोह” केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि अज्ञान, भ्रम, गलत पहचान, असंयमित इच्छा और ममता की उस गांठ का भी संकेत है, जिसमें मनुष्य बँध जाता है। जब व्यक्ति इस बंधन में होता है, तब वह सही और गलत का विवेक खोने लगता है। मोहिनी एकादशी इसीलिए केवल “व्रत” नहीं, बल्कि “विवेक का अभ्यास” भी है।
मोहिनी एकादशी की व्रत-कथा का सार
मोहिनी एकादशी की कथा में बताया गया है कि श्रीराम ने महर्षि वशिष्ठ से एक ऐसे व्रत के बारे में पूछा जो दुखी मनुष्यों का कल्याण कर सके। तब महर्षि वशिष्ठ ने वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी, अर्थात मोहिनी एकादशी, का माहात्म्य बताया। उन्होंने कहा कि इस एकादशी के व्रत से मनुष्य के पाप और क्लेश नष्ट होते हैं और वह मोह के जाल से मुक्त होने लगता है। इस प्रकार कथा स्वयं यह स्थापित करती है कि यह व्रत केवल बाहरी फल नहीं देता, बल्कि आंतरिक शुद्धि का मार्ग भी है।
कथाएँ केवल इतिहास बताने के लिए नहीं होतीं; वे भाव जगाने के लिए होती हैं। मोहिनी एकादशी की कथा यह सिखाती है कि जीवन में कोई भी व्यक्ति चाहे कितना ही उलझा हुआ क्यों न हो, यदि वह भक्ति और व्रत के माध्यम से स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित करे, तो उसके जीवन में परिवर्तन संभव है। यही कथा का जीवंत संदेश है।
भगवान विष्णु और मोहिनी एकादशी
मोहिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इस दिन उनकी उपासना का विशेष महत्व बताया जाता है। भक्तजन भगवान विष्णु के चित्र या विग्रह के सामने दीपक जलाते हैं, पीले पुष्प चढ़ाते हैं, तुलसी दल अर्पित करते हैं, विष्णु सहस्रनाम, विष्णु मंत्र या हरिनाम का जप करते हैं। उपलब्ध धार्मिक स्रोतों में भी एकादशी को भगवान विष्णु से संबंधित अवसर के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और इस दिन उनके नाम-स्मरण को विशेष रूप से फलदायक माना गया है।
भगवान विष्णु का संबंध संरक्षण, संतुलन, धैर्य और धर्म से है। इसलिए मोहिनी एकादशी का व्रत करते समय केवल उपवास पर्याप्त नहीं माना जाता; मन को भी विष्णुमय बनाना आवश्यक माना जाता है। इसका अर्थ है—शांत भाव, संयमित वाणी, सात्विक आहार-विचार, दया, क्षमा और ईश्वर-स्मरण। तभी इस एकादशी का गहरा लाभ प्राप्त माना जाता है।
व्रत का आंतरिक अर्थ
अक्सर लोग व्रत को केवल भोजन न करने तक सीमित मान लेते हैं, लेकिन एकादशी का वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। व्रत का अर्थ है स्वयं को एक उच्च उद्देश्य के लिए अनुशासित करना। मोहिनी एकादशी पर जब व्यक्ति भोजन, स्वाद, आलस्य, वाणी, क्रोध और अन्य चंचलताओं को नियंत्रित करता है, तब वह केवल शरीर को नहीं, मन को भी साधने का प्रयास करता है। यही व्रत की आत्मा है।
मोहिनी एकादशी हमें यह सिखाती है कि मन का मोह कम किए बिना शांति संभव नहीं। मनुष्य बाहरी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ता है, लेकिन भीतर के मोह, भय और आकर्षण से मुक्त नहीं होता। यह एकादशी उसी गाँठ को ढीला करने की साधना है। यदि व्यक्ति इस दिन कुछ घंटों के लिए भी अपने मन को भगवान की ओर मोड़ दे, तो यह अभ्यास धीरे-धीरे उसके जीवन को बदल सकता है।
मोहिनी एकादशी पर क्या करें
इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन, दीप प्रज्वलन, तुलसी अर्पण और मंत्र जप किया जाता है। अनेक भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और सात्विकता का पालन करते हैं। रात्रि में हरिनाम-स्मरण, भजन, कीर्तन, कथा-श्रवण या विष्णु-संबंधित ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है। धार्मिक सामग्री में एकादशी व्रत के समय भोजन और आचरण के विषय में सावधानी रखने पर भी जोर दिया गया है।
कुछ लोग केवल फलाहार करते हैं, कुछ निर्जल या जल-सेवन सहित व्रत रखते हैं, और कुछ अपने स्वास्थ्य के अनुसार सरल उपवास करते हैं। यहाँ मूल बात कठोरता नहीं, श्रद्धा और शुद्धता है। यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्यवश पूर्ण उपवास न रख सके, तो भी वह सात्विक भोजन, जप और भगवान विष्णु का स्मरण करके एकादशी का पालन कर सकता है।
मोहिनी एकादशी पर क्या न करें
एकादशी का व्रत संयम का व्रत है, इसलिए इस दिन क्रोध, कटु वचन, झूठ, निंदा, विवाद, हिंसक प्रवृत्ति और असात्त्विक आचरण से बचना अच्छा माना जाता है। यदि व्यक्ति उपवास रखे पर मन में द्वेष, चिड़चिड़ापन और अशांत विचार भरे हों, तो व्रत का आंतरिक फल कम हो जाता है। इसलिए मोहिनी एकादशी पर विशेष रूप से मन की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, इस दिन केवल दिखावे की पूजा से बचकर भावपूर्ण साधना करना अधिक हितकारी माना जाता है। भगवान विष्णु को भक्ति प्रिय है, आडंबर नहीं। मन शांत हो, वाणी मधुर हो, दृष्टि विनम्र हो—तो एकादशी का प्रभाव अधिक शुभ माना जाता है।
मोहिनी एकादशी और मन की शुद्धि
मोहिनी एकादशी की सबसे गहरी साधना मन को देखना है। मनुष्य कई बार अपने ही विचारों, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं से बँधा रहता है। उसे लगता है कि वह स्वतंत्र है, लेकिन वास्तव में वह अपने मोहों, अपेक्षाओं और आकर्षणों का दास बन जाता है। मोहिनी एकादशी ऐसे ही बंधनों को पहचानने का अवसर देती है।
इस दिन यदि कोई व्यक्ति थोड़ी देर मौन रहे, थोड़ी देर ध्यान करे, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “श्री विष्णवे नमः” जैसे मंत्रों का जप करे, और अपने मन में उठ रही इच्छाओं को शांत भाव से देखे, तो उसे एहसास होगा कि एकादशी केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरी मानसिक साधना भी है। यही इसकी विशेषता है।
वैशाख मास और मोहिनी एकादशी
वैशाख मास स्वयं में पुण्यकारी माना जाता है। इस मास में स्नान, दान, उपवास और विष्णु-भक्ति का महत्व शास्त्रीय परंपराओं में बार-बार बताया गया है। ऐसे में वैशाख शुक्ल एकादशी का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। यह तिथि भक्ति और शुद्धि दोनों का संगम बन जाती है।
वैशाख की जलवायु भी प्रतीकात्मक है—गर्मी, तप, धैर्य और सहनशीलता। इसी तरह मोहिनी एकादशी भी भीतर के ताप को शांति में बदलने की प्रेरणा देती है। जब व्यक्ति वैशाख की तपन के बीच भगवान की शरण में जाता है, तब वह भीतर की शीतलता का अनुभव कर सकता है।
पारिवारिक और सामाजिक दृष्टि से महत्व
मोहिनी एकादशी का एक सुंदर पक्ष यह भी है कि यह घर-परिवार में सात्विकता लाने का अवसर बन सकती है। यदि परिवार के सदस्य मिलकर पूजा करें, कथा सुनें, विष्णु सहस्रनाम या भजन सुनें, और दिनभर सरलता बनाए रखें, तो घर का वातावरण शांत और पवित्र होता है। इससे बच्चों में भी धार्मिक संस्कार और संयम की भावना आती है।
सामाजिक रूप से भी यह तिथि दया और सेवा का संदेश देती है। इस दिन यदि कोई व्यक्ति जरूरतमंदों को फल, जल, अन्न या वस्त्र दे, तो यह एकादशी के सात्विक भाव को और अधिक सार्थक बनाता है। व्रत केवल अपने लिए नहीं, करुणा का विस्तार करने के लिए भी होना चाहिए।
मोहिनी एकादशी और मोक्ष का भाव
धार्मिक साहित्य में एकादशी को मोक्षदायिनी तिथि कहा गया है। मोहिनी एकादशी के संदर्भ में भी यह माना जाता है कि यह व्रत पापों का नाश कर मनुष्य को उच्च आध्यात्मिक स्थिति की ओर ले जाता है। “मोह” से “मुक्ति” का यह मार्ग सीधा नहीं, परंतु अत्यंत सुंदर है। जब व्यक्ति अपनी चंचलता को देखकर उसे भगवान के चरणों में रख देता है, तभी उसकी यात्रा भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ती है।
यहाँ मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन में भी बंधनों से हल्का होना है। जो व्यक्ति क्रोध, लालच, भय और असंतोष से कुछ हद तक मुक्त होने लगे, वह भी एक प्रकार की आध्यात्मिक मुक्ति का अनुभव करता है। मोहिनी एकादशी यही अनुभव कराने का अवसर देती है।
आधुनिक जीवन में मोहिनी एकादशी की प्रासंगिकता
आज के समय में मनुष्य अनेक प्रकार के “मोह” में घिरा है—डिजिटल व्यस्तता, तुलना, लालसा, प्रतिष्ठा की दौड़, अनावश्यक चिंता, संबंधों की उलझनें, और निरंतर असंतोष। ऐसे समय में मोहिनी एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह हमें एक दिन रुकने, शांत होने, उपवास करने, स्वयं को देखने और भगवान विष्णु की शरण में बैठने की प्रेरणा देती है।
यदि कोई व्यक्ति महीने में दो दिन आने वाली एकादशी का भी थोड़ा अभ्यास करे, तो उसका जीवन अधिक अनुशासित, सात्विक और केंद्रित हो सकता है। मोहिनी एकादशी विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मन के आकर्षणों को पहचानने और उन्हें भगवान के चरणों में समर्पित करने का सुंदर अवसर है।
मोहिनी एकादशी 2026 सोमवार, 27 अप्रैल को मनाई जाएगी और यह वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह तिथि पापों और क्लेशों के नाश तथा मोह से मुक्ति का मार्ग प्रदान करने वाली मानी गई है। भगवान विष्णु को समर्पित यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि मन, वाणी और आचरण की शुद्धि का दिव्य अवसर है।
जो व्यक्ति श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ मोहिनी एकादशी का पालन करता है, वह केवल धार्मिक पुण्य ही नहीं, बल्कि मन की गहराई में शांति और स्पष्टता भी अनुभव कर सकता है। यह तिथि हमें सिखाती है कि सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, भीतर है—और उस युद्ध में भगवान विष्णु की शरण, जप, व्रत और भक्ति हमारा सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं।
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