बांके बिहारी हरियाली तीज: सोने और चांदी के झूले पर ठाकुरजी

बांके बिहारी हरियाली तीज पर सोने और चाँदी के झूले पर बैठे भगवान का श्रृंगार, फूलों की माला और भक्तजन

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बांके बिहारी हरियाली तीज वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में मनाई जाने वाली 79 वर्ष पुरानी अद्भुत परंपरा है, जिसमें श्री बांके बिहारी जी 10 किलोग्राम सोने और 1,000 किलोग्राम चांदी से निर्मित भव्य झूले पर विराजमान होते हैं। यह दिव्य उत्सव सावन के महीने में हरियाली तीज के अवसर पर आयोजित होता है और श्रद्धालुओं को अपूर्व दर्शन का अवसर प्रदान करता है।

बांके बिहारी हरियाली तीज का महत्व

हरियाली तीज भगवान श्री कृष्ण और माता राधा रानी की प्रेम लीला को समर्पित पावन पर्व है। वृंदावन में इस पर्व का विशेष महत्व है क्योंकि यहीं श्री कृष्ण ने अपनी बाल लीलाएं और रास रचाई थीं। सावन मास की तृतीया तिथि को मनाई जाने वाली यह तीज प्रकृति के हरे-भरे रूप का उत्सव है।

बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी हरियाली तीज की परंपरा 1947 से चली आ रही है। यह उत्सव श्री कृष्ण के प्रति भक्तों की अगाध आस्था और प्रेम का प्रतीक है। मंदिर प्रबंधन हर वर्ष इस दिन विशेष व्यवस्था करता है।

स्वर्ण और रजत के अद्भुत झूले की विशेषता

बांके बिहारी मंदिर का यह झूला भारत के सबसे भव्य और बहुमूल्य मंदिर झूलों में से एक है। 10 किलोग्राम शुद्ध स्वर्ण और 1,000 किलोग्राम चांदी से निर्मित यह झूला कारीगरी का अद्भुत नमूना है। सावन के महीने में जब ठाकुरजी इस दिव्य झूले पर विराजते हैं, तो दर्शन का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है।

झूले को विशेष रूप से फूलों, हरी पत्तियों और रंगीन कपड़ों से सजाया जाता है। मंदिर में भक्ति संगीत और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। श्रद्धालु श्री बांके बिहारी जी को झूला झुलाते हुए देखकर धन्य हो जाते हैं।

बांके बिहारी हरियाली तीज का उत्सव और परंपरा

हरियाली तीज के दिन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भोर से ही भक्तों की भीड़ दर्शन के लिए उमड़ पड़ती है। मंदिर प्रबंधन दर्शन की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाता है ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु ठाकुरजी के झूले के दर्शन कर सकें।

इस दिन भगवान को विशेष भोग लगाया जाता है। मक्खन मिश्री, छप्पन भोग और मौसमी फलों का भोग अर्पित किया जाता है। संध्या आरती के समय मंदिर में अलौकिक वातावरण बन जाता है।

श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की व्यवस्था

वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर वर्ष भर श्रद्धालुओं से भरा रहता है, लेकिन बांके बिहारी हरियाली तीज के अवसर पर विशेष भीड़ उमड़ती है। मंदिर प्रशासन इस दिन अतिरिक्त सुरक्षा और दर्शन की व्यवस्था करता है। भक्तों को सुबह से शाम तक दर्शन का अवसर मिलता है।

दूर-दूर से भक्त इस पावन अवसर पर वृंदावन आते हैं। कई श्रद्धालु कई दिन पहले से ही वृंदावन पहुंच जाते हैं ताकि वे इस विशेष दर्शन से वंचित न रहें। मंदिर के आसपास का पूरा क्षेत्र भक्ति के रंग में रंग जाता है।

बांके बिहारी मंदिर का इतिहास और परंपरा

बांके बिहारी मंदिर की स्थापना 1864 में हुई थी। यह मंदिर वृंदावन के सबसे प्रतिष्ठित और प्राचीन मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी का अर्थ है ‘तीन स्थानों पर झुके हुए श्री कृष्ण’। ठाकुरजी की मूर्ति अत्यंत मनमोहक है और भक्तों को दर्शन मात्र से शांति मिलती है।

मंदिर में कई विशेष परंपराएं हैं। यहां मंगला आरती नहीं होती क्योंकि मान्यता है कि बाल स्वरूप ठाकुरजी को नींद से नहीं जगाना चाहिए। झूलन उत्सव, फूलों की होली, जन्माष्टमी जैसे अनेक उत्सव यहां धूमधाम से मनाए जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बांके बिहारी हरियाली तीज कब मनाई जाती है?

यह पर्व सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह 15-16 अगस्त को मनाई गई।

बांके बिहारी का झूला किस धातु से बना है?

झूला 10 किलोग्राम शुद्ध सोने और 1,000 किलोग्राम चांदी से निर्मित है। यह परंपरा 79 वर्ष से चली आ रही है।

बांके बिहारी मंदिर दर्शन का समय क्या है?

मंदिर सुबह लगभग 7:45 बजे खुलता है और रात्रि लगभग 9 बजे बंद होता है। हरियाली तीज के दिन विशेष व्यवस्था रहती है।

वृंदावन कैसे पहुंचें?

वृंदावन मथुरा से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। दिल्ली से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

हरियाली तीज का क्या महत्व है?

हरियाली तीज श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रेम का पर्व है। यह सावन की हरियाली और प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव भी है।

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