Shrimad Bhagwat Mahapuran: श्रीमद्भागवत महापुराण हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख महापुराणों में से एक है। यह भगवान विष्णु और उनके विभिन्न अवतारों की लीलाओं का विस्तार से वर्णन करता है। इस ग्रंथ को महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित माना जाता है और यह विशेष रूप से भक्ति योग पर केंद्रित है। इसमें कुल 12 स्कंध और 18,000 श्लोक हैं, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएँ, नरसिंह अवतार, समुद्र मंथन, राजा हरिश्चंद्र, ध्रुव की तपस्या जैसी अनेक कथाएँ सम्मिलित हैं।
इस ब्लॉग में हम श्रीमद्भागवत महापुराण की 5 प्रसिद्ध कथाएँ विस्तार से प्रस्तुत कर रहे हैं, जो न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि जीवन में नैतिकता, भक्ति और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देती हैं।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 7, अध्याय 8-10)
हिरण्यकशिपु एक असुर राजा था, जिसने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि उसे—
इस वरदान के कारण वह अजेय हो गया और स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।
परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। उसने पिता के लाख प्रयासों के बावजूद विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी।
जब कोई भी उपाय सफल नहीं हुआ, तो हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, “तेरा भगवान कहाँ है?”
प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “वे सर्वत्र हैं, यहाँ तक कि इस खंभे में भी!”
भगवान नरसिंह का प्रकट होना:
हिरण्यकशिपु ने क्रोधित होकर खंभे को तोड़ दिया, और तभी भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार (अर्ध-पुरुष, अर्ध-सिंह) में प्रकट होकर उसे संध्या के समय, देहली पर, अपने नाखूनों से मार दिया।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 8, अध्याय 5-12)
देवताओं और असुरों के बीच लगातार युद्ध चल रहा था। एक समय ऐसा आया जब देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त किया जाए, जिससे देवता फिर से शक्तिशाली हो सकें।
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को भ्रमित किया और केवल देवताओं को अमृत पिलाया।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 4, अध्याय 8-12)
प्राचीन काल में राजा उत्तानपाद का राज्य था। उनकी दो पत्नियाँ थीं – सुनीति और सुरुचि। सुनीति से उनका पुत्र ध्रुव हुआ और सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र। राजा सुरुचि से अधिक प्रेम करते थे, जिससे ध्रुव और उनकी माता सुनीति उपेक्षित रहते थे।
एक दिन जब राजा उत्तानपाद अपने छोटे पुत्र उत्तम को गोद में बैठाए हुए थे, तब बालक ध्रुव भी अपने पिता की गोद में बैठने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन उसकी सौतेली माँ सुरुचि ने क्रोधपूर्वक उसे रोक दिया और कहा –
“यदि तुम राजा की गोद में बैठना चाहते हो, तो पहले भगवान नारायण की तपस्या करो, जिससे तुम अगले जन्म में मेरे गर्भ से जन्म ले सको!”
इस कठोर अपमान से ध्रुव अत्यंत दुखी और व्यथित हो गए। रोते हुए वे अपनी माँ सुनीति के पास आए और पूरी घटना सुनाई। माँ ने धैर्यपूर्वक कहा –
“बेटा, तुम्हें जो भी चाहिए, वह राजा से नहीं, केवल भगवान से ही मिल सकता है। इसलिए यदि तुम सच में राज्य और सम्मान चाहते हो, तो श्रीहरि की आराधना करो!”
माँ के वचनों को सत्य मानकर 5 वर्षीय बालक ध्रुव अकेले जंगल की ओर निकल पड़े। मार्ग में उन्हें महर्षि नारद मिले, जिन्होंने कहा कि जंगल में जाकर तपस्या करना अत्यंत कठिन कार्य है, विशेष रूप से एक बालक के लिए। लेकिन ध्रुव का संकल्प अटल था। उन्होंने कहा –
“हे मुनिवर! यदि भगवान की कृपा से मैं अपने पिता की गोद में बैठने का अधिकार नहीं पा सकता, तो मैं वह स्थान प्राप्त करूंगा, जिसे कोई भी पा न सके!”
ध्रुव ने यमुना तट पर जाकर घोर तपस्या शुरू की –
उनकी कठोर तपस्या से तीनों लोकों में हलचल मच गई। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे ध्रुव को दर्शन दें।
भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए और ध्रुव से कहा –
“वत्स! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। कहो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए?”
ध्रुव बोले –
“हे प्रभु! अब मेरा अहंकार समाप्त हो चुका है। मैं केवल आपकी भक्ति चाहता हूँ!”
भगवान ने कहा –
“हे ध्रुव! तुम्हारी तपस्या के कारण तुम्हें स्वर्ग में एक अटल स्थान प्राप्त होगा। तुम्हें ध्रुव तारा (पोलर स्टार) का स्थान मिलेगा, जो सृष्टि के अंत तक अडिग रहेगा!”
इसके बाद ध्रुव अपने पिता के राज्य लौटे। राजा उत्तानपाद ने उन्हें राजसिंहासन सौंप दिया और स्वयं वन में चले गए।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 8, अध्याय 18-22)
असुरों के महान राजा बलि अपनी दानशीलता और शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। वे प्रह्लाद के वंशज थे और भगवान विष्णु के परम भक्त भी। अपनी तपस्या और बल के कारण उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और स्वर्ग लोक के राजा इंद्र को भी पराजित कर दिया।
जब बलि ने स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया, तब पराजित देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की।
भगवान ने वामन अवतार (एक बौने ब्राह्मण के रूप में) लिया और राजा बलि से भिक्षा मांगने गए।
जब भगवान वामन राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुँचे, तो उन्होंने कहा –
“हे दानवीर बलि! मैं केवल तीन पग भूमि चाहता हूँ।”
राजा बलि ने हँसते हुए कहा –
“हे ब्राह्मण! आप चाहें तो पूरा राज्य माँग सकते हैं, केवल तीन पग भूमि क्यों?”
वामन ने उत्तर दिया –
“जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को सीमित नहीं करता, वह सम्पूर्ण पृथ्वी पाकर भी संतुष्ट नहीं होता। तीन पग भूमि मेरे लिए पर्याप्त है।”
राजा बलि ने सहर्ष भिक्षा देने की स्वीकृति दे दी।
जैसे ही बलि ने संकल्प लिया, भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर लिया –
भगवान ने बलि से कहा –
“अब बताओ, मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ?”
राजा बलि ने उत्तर दिया –
“हे प्रभु! आपने संपूर्ण ब्रह्मांड ले लिया, अब केवल मेरा शीश बचा है। कृपया तीसरा पग मेरे सिर पर रखें।”
भगवान ने तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया।
बलि की भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा –
“हे बलि! मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हूँ। तुम पाताल लोक के राजा बनोगे और जब कलियुग समाप्त होगा, तब तुम्हें इंद्र का पद प्राप्त होगा!”
भगवान स्वयं बलि के द्वारपाल बनकर पाताल लोक में निवास करने लगे।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 10, अध्याय 24-25)
ब्रजभूमि में जब बालक श्रीकृष्ण बड़े हो रहे थे, तब वहाँ के लोग प्रत्येक वर्ष इंद्र देव की पूजा करते थे, ताकि वर्षा होती रहे और अच्छी फसल उग सके।
श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा –
“हम सब गोपालक हैं और हमारी आजीविका गऊओं और गोवर्धन पर्वत पर निर्भर करती है। अतः हमें इंद्र की पूजा करने की आवश्यकता नहीं, बल्कि हमें गोवर्धन पर्वत और गौ माता की पूजा करनी चाहिए!”
गोपों ने श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा की और इंद्र की पूजा बंद कर दी।
इंद्र ने स्वयं का अपमान समझा और क्रोध में आकर ब्रजभूमि पर लगातार 7 दिनों तक घोर वर्षा शुरू कर दी। यह वर्षा इतनी भीषण थी कि समस्त ब्रज डूबने लगा।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और समस्त गोप-गोपियों तथा गऊओं को उसके नीचे आश्रय दिया।
इंद्र ने देखा कि उनकी प्रचंड वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा, तो उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली और श्रीकृष्ण के चरणों में आकर क्षमा मांगी।
भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र से कहा –
“हे इंद्र! अहंकार मनुष्य के पतन का कारण है। सच्चे देवता वे हैं जो दूसरों की सेवा करते हैं, न कि वे जो दूसरों से अपनी पूजा करवाते हैं!”
इंद्र ने अपनी गलती स्वीकार की और श्रीकृष्ण को गोविंद (गौओं के स्वामी) के नाम से संबोधित किया।
श्रीमद्भागवत महापुराण की ये कथाएँ हमें सिखाती हैं कि भक्ति, सत्य, धैर्य और परिश्रम से जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है। यह ग्रंथ केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को सिखाने वाला अध्यात्मिक मार्गदर्शक है।
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