Shrimad Bhagwat Mahapuran : श्रीमद्भागवत महापुराण हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है, जिसमें भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और उनकी लीलाओं का वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ हमें धर्म, भक्ति और मोक्ष की राह दिखाता है।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 8, अध्याय 9-12)
भस्मासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और वरदान माँगा कि जिसके सिर पर वह हाथ रखे, वह भस्म हो जाए।
भगवान शिव ने वरदान दे दिया, लेकिन भस्मासुर ने शिवजी को ही नष्ट करने का प्रयास किया।
शिवजी भयभीत होकर भागने लगे और भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने एक अति सुंदर स्त्री (मोहिनी) का रूप धारण किया और भस्मासुर को मोहित कर लिया।
मोहिनी ने भस्मासुर से नृत्य करने को कहा, और नृत्य करते हुए भस्मासुर ने अपने ही सिर पर हाथ रख दिया, जिससे वह स्वयं भस्म हो गया।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 10, अध्याय 80-81)
सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र थे, लेकिन वे अत्यंत गरीब ब्राह्मण थे।
उनकी पत्नी ने उन्हें भगवान श्रीकृष्ण से सहायता माँगने के लिए द्वारका जाने को कहा।
सुदामा कृष्ण के लिए कुछ सत्तू (चिवड़ा) लेकर गए।
जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो भगवान श्रीकृष्ण दौड़कर आए, उन्हें गले लगाया और उनके चरण धोए।
सुदामा संकोच के कारण अपना चिवड़ा नहीं दे पा रहे थे, लेकिन श्रीकृष्ण ने जबर्दस्ती उनके झोले से निकालकर खा लिया।
सुदामा बिना कुछ माँगे लौट आए, लेकिन जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो देखा कि उनकी झोपड़ी भव्य महल में बदल चुकी थी।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 10, अध्याय 43-44)
कंस ने अपनी बहन देवकी के पुत्रों को मारने का संकल्प लिया था क्योंकि उसे आकाशवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा।
कृष्ण जन्म के बाद गोकुल में पले-बढ़े और जब युवा हुए, तो अक्रूर उन्हें मथुरा लाने आए।
मल्लयुद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने चाणूर और बलराम ने मुष्टिक नामक पहलवानों का वध किया।
फिर श्रीकृष्ण ने कंस को पकड़कर सिंहासन से नीचे फेंका और उसका वध कर दिया।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 10, अध्याय 52-54)
विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती थीं, लेकिन उनके भाई रुक्मी ने जबरदस्ती उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया।
रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को गुप्त पत्र लिखा और उनसे विवाह के लिए सहायता माँगी।
श्रीकृष्ण ने रथ पर रुक्मिणी का हरण किया, और बलराम ने रुक्मी और शिशुपाल की सेना को हरा दिया।
रुक्मी ने श्रीकृष्ण को रोकने का प्रयास किया, लेकिन श्रीकृष्ण ने उसके सिर के बाल काटकर उसे अपमानित किया।
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 10, अध्याय 16-17)
यमुना नदी में कालिय नाग का वास था, जो अपने विष से जल को जहरीला बना चुका था।
गोप और गाएँ यमुना का जल पीकर मरने लगे।
श्रीकृष्ण यमुना में कूदे और कालिय नाग से युद्ध किया।
फिर उन्होंने कालिय नाग के फनों पर नृत्य किया, जिससे नाग अत्यधिक कमजोर हो गया।
कालिय की पत्नियाँ श्रीकृष्ण से क्षमा माँगने लगीं, तब भगवान ने कालिय को रामेश्वरम के पास समुद्र में जाने का आदेश दिया।
श्रीमद्भागवत पुराण की इन अद्भुत कथाओं से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्ति, संकल्प, जिम्मेदारी और भगवान के प्रति श्रद्धा ही सच्ची सफलता की कुंजी है।
“जो सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, उसे वे कभी निराश नहीं करते।”
“सर्वं श्रीकृष्णार्पणमस्तु!”
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