श्री पार्वती चालीसा
माँ पार्वती सनातन धर्म में केवल भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में ही पूजित नहीं हैं, बल्कि वे आदिशक्ति, करुणा, तप, सौभाग्य, प्रेम, धैर्य और समर्पण की जीवंत प्रतिमा हैं। श्री पार्वती चालीसा माँ पार्वती के दिव्य स्वरूप, उनके अद्भुत सौंदर्य, कठोर तपस्या, भक्तवत्सल स्वभाव और जगत कल्याणकारी रूप का अत्यंत सुंदर स्तवन है। जो भी श्रद्धा और विश्वास के साथ श्री पार्वती चालीसा का पाठ करता है, उसके जीवन में शांति, स्थिरता, भक्ति, पारिवारिक सुख और आंतरिक शक्ति का संचार होता है।
माँ पार्वती को गौरी, उमा, भवानी, अन्नपूर्णा, शंकरी, माहेश्वरी, दुर्गा और अम्बिका जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। इन सभी नामों में उनके अलग-अलग स्वरूप छिपे हैं। कहीं वे सौम्य हैं, कहीं तपस्विनी हैं, कहीं गृहस्थ जीवन की आदर्श देवी हैं, कहीं संहार शक्ति हैं, तो कहीं जगत का पालन करने वाली अन्नपूर्णा हैं। यही कारण है कि श्री पार्वती चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और जीवन मूल्यों का अद्भुत संगम है।
नीचे श्री पार्वती चालीसा का पूर्ण पाठ दिया जा रहा है, उसके बाद इसका महत्व, अर्थ और विस्तृत ब्लॉग प्रस्तुत है।
Table of Contents
Toggleश्री पार्वती चालीसा
॥ दोहा ॥
जय गिरि तनये दुर्गे शम्भू प्रिये गुणखानी।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानी॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरे पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥
तेरो पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित सजाता।
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे॥
ललित लालट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनोहर।
कनक बसन कञ्चुकि सजाये, कटी मेखला दिव्य लहराए॥
कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।
बालारुण अनंत छवि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी॥
नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजित हरी चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥
गिर कैलाश निवासिनी जय जय, कोटिकप्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल, कुटुंब तिहारी, अणु-अणु महं तुम्हारी उजियारी॥
हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥
बुढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावै कोउ तिनकी।
सदा श्मशान विहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥
कंठ हलाहल को छवि छायी, नीलकंठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हों, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो॥
ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।
देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥
भयभीता सो माता गंगा, लज्जामय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भु पहिं आयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥
तेहिकों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो।
नित्यानन्द करी वरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥
अखिल पाप त्रयताप निकन्दनी, माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी।
काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करी अवलम्बे॥
गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥
तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्र तन भयउ तुम्हारा॥
पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे॥
तब तब जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि निज गेह सिधारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए॥
मांगे उमा वर पति तुम तिनसो, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए॥
करि विवाह शिव सों हे भामा, पुनः कहाई हर की बामा।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जनसुख देइहै तेहि ईसा॥
॥ दोहा ॥
कूट चन्द्रिका सुभग शिर, जयति शुचि खानी।
पार्वती निज भक्त हित, रहउ सदा वरदानी॥

श्री पार्वती चालीसा का महत्व
श्री पार्वती चालीसा का महत्व केवल धार्मिक पाठ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन के रूप में भी है। इस चालीसा में माँ पार्वती के रूप, गुण, तप, पतिव्रत धर्म, करुणा, शक्ति और भक्तों के प्रति उनकी कृपा का अत्यंत सुंदर वर्णन है। यह चालीसा भक्त को सिखाती है कि जीवन में प्रेम, धैर्य, निष्ठा, तप, समर्पण और शक्ति का संतुलन कितना आवश्यक है।
माँ पार्वती को शक्ति का मूल स्रोत माना गया है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। शिव चेतना हैं तो पार्वती शक्ति हैं। शिव आधार हैं तो पार्वती अभिव्यक्ति हैं। शिव समाधि हैं तो पार्वती सृष्टि हैं। इसलिए माँ पार्वती का स्मरण केवल देवी पूजा नहीं, बल्कि जीवन में ऊर्जा, करुणा और संतुलन को स्वीकार करना भी है।
प्रारंभिक दोहे का अर्थ
जय गिरि तनये दुर्गे शम्भू प्रिये गुणखानी।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानी॥
इस दोहे में माँ पार्वती को हिमालय की पुत्री, शिव की प्रिय, गणेशजी की माता, शक्ति और भवानी के रूप में प्रणाम किया गया है। एक ही पंक्ति में माँ के अनेक रूपों का स्मरण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पार्वती केवल एक पारिवारिक देवी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की दिव्य शक्ति हैं। वे मातृत्व की भी प्रतिमा हैं, शक्ति की भी, करुणा की भी, और दिव्य स्त्रीत्व की भी।
माँ श्री पार्वती की महिमा अगम है
ब्रह्मा भेद न तुम्हरे पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥
इन पंक्तियों में कहा गया है कि स्वयं ब्रह्मा भी माँ पार्वती की पूर्ण महिमा नहीं जान सकते। पंचमुख शिव भी उनका ध्यान करते हैं, षडानन कार्तिकेय भी उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते और सहस्रमुख शेषनाग भी थक जाते हैं। इसका भाव यह है कि माँ की शक्ति सीमित बुद्धि से परे है। ईश्वर की महिमा को केवल शब्दों में बाँधना संभव नहीं है।
भक्त के लिए इसका संदेश यह है कि माँ को केवल तर्क से नहीं, बल्कि भक्ति, श्रद्धा और अनुभव से जाना जा सकता है।
माँ पार्वती का सौंदर्य और दिव्य रूप
चालीसा में माँ के सौंदर्य का अत्यंत मनमोहक वर्णन है:
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे।
ललित लालट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनोहर॥
यह वर्णन केवल बाहरी सुंदरता का नहीं है। यह उस दिव्य आभा का चित्रण है जो भक्त के मन को आकर्षित करती है। माँ के अरुण अधर प्रेम और कोमलता का प्रतीक हैं, कजरारे नेत्र करुणा और जाग्रति के प्रतीक हैं, केसर, कुंकुम और अक्षत मंगल, शक्ति और पवित्रता का संकेत हैं।
कनक बसन कञ्चुकि सजाये, कटी मेखला दिव्य लहराए॥
यहाँ माँ की दिव्य राजसी छवि प्रस्तुत की गई है। श्री पार्वती सौंदर्य और तेज की अधिष्ठात्री हैं। वे हमें सिखाती हैं कि दिव्यता में सौंदर्य भी है, मर्यादा भी है और गरिमा भी।
माँ का सिंहासन और उनकी सार्वभौमिक सत्ता
नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजित हरी चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥
इन पंक्तियों में माँ को विश्व की आराध्य देवी के रूप में दिखाया गया है। देवता, यक्ष, नाग, पशु-पक्षी—सभी उनकी सत्ता को स्वीकारते हैं। इसका अर्थ है कि माँ किसी एक वर्ग, जाति, स्थिति या क्षेत्र की देवी नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की शक्ति हैं।
यह हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर सबके हैं। माँ का आशीर्वाद किसी एक पर सीमित नहीं होता। जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वह उनकी कृपा का अधिकारी बनता है।
कैलाशवासिनी माँ पार्वती
गिर कैलाश निवासिनी जय जय, कोटिकप्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल, कुटुंब तिहारी, अणु-अणु महं तुम्हारी उजियारी॥
माँ श्री पार्वती कैलाश की अधिष्ठात्री हैं। कैलाश केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि वैराग्य, तप, समाधि और दिव्य शांति का प्रतीक है। जब चालीसा माँ को कैलाशवासिनी कहती है, तो यह बताती है कि वे सांसारिक जीवन के बीच भी आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे गृहस्थी में रहकर भी योग की अधिष्ठात्री हैं।
“अणु-अणु महं तुम्हारी उजियारी” का अर्थ है कि संसार के प्रत्येक कण में उनकी शक्ति विद्यमान है। यह अद्वैत का संकेत भी है कि ईश्वर सर्वत्र हैं।
शिव-पार्वती का दिव्य संबंध
हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥
यहाँ श्री पार्वती को उस महान सौभाग्यशालिनी देवी के रूप में चित्रित किया गया है जिन्हें स्वयं महादेव पति रूप में प्राप्त हुए। लेकिन यह प्राप्ति सहज नहीं थी। इसके पीछे माँ का अनंत तप, समर्पण और धैर्य था। यह संदेश देता है कि श्रेष्ठ प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ साधना करनी पड़ती है।
शिव और पार्वती का संबंध केवल पति-पत्नी का संबंध नहीं है; यह चेतना और शक्ति का शाश्वत मिलन है। शिव बिना शक्ति के निष्क्रिय हैं और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन। यही कारण है कि सनातन परंपरा में शिव-पार्वती को आदर्श दांपत्य और दिव्य एकत्व का प्रतीक माना गया है।
भगवान शिव का वर्णन और उसका संकेत
बुढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावै कोउ तिनकी।
सदा श्मशान विहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥
शिव का यह औघड़, विरक्त, अलौकिक स्वरूप सामान्य दृष्टि से विचित्र लग सकता है, पर यही उनकी महिमा है। वे दिखावे से परे हैं। भस्म धारण करते हैं, नाग पहनते हैं, श्मशान में विचरते हैं। इसका अर्थ है कि वे मृत्यु, भय और माया से परे हैं।
श्री पार्वती का ऐसे शिव को पति रूप में स्वीकारना केवल प्रेम नहीं, बल्कि सत्य को स्वीकारना है। वे बाहरी रूप नहीं, भीतर की दिव्यता को देखती हैं। यह हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम दिखावे पर नहीं, आत्मा पर आधारित होता है।
नीलकंठ शिव और पार्वती का मंगलकारी स्वरूप
कंठ हलाहल को छवि छायी, नीलकंठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हों, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो॥
समुद्र मंथन के विष को शिव ने अपने कंठ में धारण किया। यह त्याग, लोककल्याण और करुणा का श्रेष्ठ उदाहरण है। माँ पार्वती ऐसी शिव की अर्धांगिनी हैं, इसलिए वे भी जगत कल्याण की अधिष्ठात्री हैं।
ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी॥
यहाँ माँ को मंगलमयी और पाप-नाशिनी कहा गया है। वे केवल शिव की पत्नी नहीं, बल्कि स्वयं कल्याण और शक्ति की प्रतिमा हैं।
गंगा प्रसंग और पार्वती की गरिमा
भयभीता सो माता गंगा, लज्जामय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भु पहिं आयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥
इस प्रसंग में गंगा और पार्वती का उल्लेख आता है। यहाँ भाव यह है कि माँ पार्वती की गरिमा, सौभाग्य और स्थान इतना ऊँचा है कि स्वयं गंगा भी विनम्र हो जाती हैं। यह माँ के गौरवपूर्ण, पतिव्रता और परम सम्माननीय स्वरूप को दर्शाता है।
माँ पार्वती: पाप और ताप का नाश करने वाली
अखिल पाप त्रयताप निकन्दनी, माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी।
काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥
त्रयताप यानी दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट। माँ पार्वती इन तीनों प्रकार के दुखों को हरने वाली हैं। वे शरीर के दुख, भाग्य के दुख और संसारजन्य दुख—सभी से रक्षा करती हैं। यही कारण है कि भक्त उन्हें केवल देवी के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की पीड़ा दूर करने वाली माँ के रूप में पुकारते हैं।
माँ अन्नपूर्णा और भगवती का रूप
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करी अवलम्बे॥
यहाँ माँ को भिक्षा देने वाली, कृपा, आनंद और स्नेह की दात्री कहा गया है। यही माँ का अन्नपूर्णा रूप है। वे केवल भोजन नहीं देतीं, बल्कि जीवन का पोषण करती हैं। शरीर को अन्न, मन को शांति, वाणी को मधुरता और आत्मा को आश्रय—यह सब माँ की कृपा से मिलता है।
गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥
इन पंक्तियों में माँ के अनेक रूप एक साथ आते हैं। गौरी का अर्थ है उज्ज्वल और मंगलमयी। उमा तपस्विनी हैं। शंकरी शिव की शक्ति हैं। काली दुष्टों का संहार करती हैं। अन्नपूर्णा पालन करती हैं। सती निष्ठा की प्रतिमा हैं। इन सभी रूपों से स्पष्ट है कि माँ पार्वती सम्पूर्ण स्त्री-शक्ति का दिव्य स्वरूप हैं।
माँ पार्वती की कठोर तपस्या
तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्र तन भयउ तुम्हारा॥
यह चालीसा का सबसे प्रेरणादायक भाग है। माँ श्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। उन्होंने अन्न, जल, यहाँ तक कि वायु तक का त्याग कर दिया। उनका शरीर अस्थिमात्र रह गया, पर उनका संकल्प नहीं टूटा।
आज के जीवन में यह प्रसंग हमें क्या सिखाता है? यह सिखाता है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, मन स्थिर हो और विश्वास अटल हो, तो कठिन से कठिन मार्ग भी पार किया जा सकता है। तप का अर्थ केवल जंगल में साधना नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य के लिए संयम, धैर्य और समर्पण रखना भी है।
उमा नाम की प्राप्ति
पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे॥
जब माँ ने पत्तों का भी त्याग कर दिया, तब उन्हें “उमा” कहा गया। यह नाम केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि तप, त्याग और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। सप्तऋषियों ने उनकी परीक्षा ली, उन्हें डिगाने का प्रयास किया, पर वे अडिग रहीं।
यह प्रसंग हमें यह सीख देता है कि सच्चे साधक का मन बाहरी परीक्षा से नहीं डिगता। जीवन में भी जब लक्ष्य सच्चा हो, तब आलोचना, बाधाएँ, भ्रम और प्रलोभन हमें विचलित नहीं कर पाते।
तपस्या का फल और वरदान
तब तब जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि निज गेह सिधारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए॥
जब माँ की तपस्या पूर्ण हुई, तब देवता स्वयं प्रसन्न होकर आए। यह बताता है कि सच्चा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। ईश्वर देर कर सकते हैं, पर अन्याय नहीं करते। जो प्रेम, निष्ठा और धैर्य के साथ साधना करता है, उसे उसका फल अवश्य मिलता है।
शिव विवाह का दिव्य प्रसंग
मांगे उमा वर पति तुम तिनसो, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए॥
श्री पार्वती ने वही वर माँगा जिन्हें समस्त संसार पूजता है—भगवान शिव। और अंततः उनकी इच्छा पूर्ण हुई।
करि विवाह शिव सों हे भामा, पुनः कहाई हर की बामा।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जनसुख देइहै तेहि ईसा॥
शिव विवाह केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा, शक्ति और चेतना, भक्ति और सत्य के मिलन का प्रतीक है। जो भक्त इस चालीसा का पाठ करता है, उसे धन, जन और सुख की प्राप्ति होती है—अर्थात जीवन में समृद्धि, संबंधों में मधुरता और मन में शांति आती है।
श्री पार्वती चालीसा पढ़ने के लाभ
श्री पार्वती चालीसा का नियमित पाठ भक्त के जीवन में अनेक प्रकार के सकारात्मक प्रभाव ला सकता है। इससे मन में शांति आती है। दांपत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। योग्य जीवनसाथी की कामना रखने वालों के लिए यह पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। विवाहित स्त्रियाँ सौभाग्य और पारिवारिक मंगल के लिए इसका पाठ करती हैं। पुरुष और महिलाएँ दोनों मानसिक स्थिरता, श्रद्धा और शक्ति के लिए इसका पाठ कर सकते हैं।
इस चालीसा का पाठ विशेष रूप से इन भावों के लिए किया जाता है:
पारिवारिक सुख के लिए,
शिव-पार्वती कृपा के लिए,
विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए,
दांपत्य प्रेम और सम्मान के लिए,
सौभाग्य और शांति के लिए,
माँ की कृपा और सुरक्षा के लिए,
तप, धैर्य और संकल्प शक्ति बढ़ाने के लिए।
श्री पार्वती चालीसा कब पढ़नी चाहिए
श्री पार्वती का स्मरण किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन कुछ अवसर विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। जैसे सोमवार, शुक्रवार, हरतालिका तीज, शिवरात्रि, नवरात्रि, श्रावण मास, तीज व्रत, गौरी पूजन आदि। यदि संभव हो, तो स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर, दीपक जलाकर, शिव-पार्वती के चित्र या प्रतिमा के सामने श्रद्धा से पाठ करना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठ केवल शब्दों से नहीं, भाव से किया जाए। यदि मन शांत और समर्पित है, तो छोटा सा स्मरण भी अत्यंत फलदायी होता है।
श्री पार्वती चालीसा का आध्यात्मिक संदेश
यह चालीसा हमें कई गहरी शिक्षाएँ देती है।
यह सिखाती है कि प्रेम के साथ धैर्य भी होना चाहिए।
यह सिखाती है कि तप के बिना उच्च प्राप्ति कठिन है।
यह सिखाती है कि बाहरी रूप से अधिक आंतरिक सत्य महत्वपूर्ण है।
यह सिखाती है कि नारी केवल कोमलता नहीं, बल्कि शक्ति का भी स्वरूप है।
यह सिखाती है कि समर्पण कमजोरी नहीं, बल्कि महान शक्ति है।
यह सिखाती है कि गृहस्थ जीवन भी आध्यात्मिक हो सकता है।
यह सिखाती है कि श्रद्धा से किया गया संकल्प ईश्वर तक पहुँचता है।
निष्कर्ष
श्री पार्वती चालीसा माँ पार्वती की करुणा, सौंदर्य, तपस्या, शक्ति, सौभाग्य और भक्तवत्सलता का अद्भुत स्तवन है। यह चालीसा केवल पाठ नहीं, बल्कि जीवन की दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। इसमें माँ के दिव्य सौंदर्य का वर्णन है, शिव के प्रति उनके समर्पण का आदर्श है, तपस्या की प्रेरणा है, गृहस्थ जीवन की पवित्रता है, और भक्त के लिए माँ के संरक्षण का आश्वासन है।
जो व्यक्ति श्रद्धा, प्रेम और विश्वास के साथ श्री पार्वती चालीसा का पाठ करता है, उसके जीवन में आस्था मजबूत होती है, मन स्थिर होता है और भीतर एक दिव्य शक्ति का अनुभव होने लगता है। माँ पार्वती हमें सिखाती हैं कि प्रेम में निष्ठा हो, जीवन में संयम हो, लक्ष्य में दृढ़ता हो और हृदय में भक्ति हो—तो ईश्वर की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
जय माँ पार्वती।
जय गौरी।
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