मलमास
सनातन हिंदू धर्म में समय की गणना अत्यंत वैज्ञानिक और खगोलीय घटनाओं पर आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य और चंद्रमा दोनों की गतियों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा पंचांग (Calendar) विकसित किया जो ऋतुओं और त्योहारों का सटीक संतुलन बनाए रखता है। इसी संतुलन को साधने की जटिल और सटीक खगोलीय प्रक्रिया में जन्म होता है ‘अधिक मास’ का, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘मलमास’ भी कहा जाता है।
लेकिन, जो मास ‘मल’ (अशुद्ध) माना जाता है, जिसमें सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, वह अचानक भगवान के सर्वोच्च नाम ‘पुरुषोत्तम’ से कैसे जुड़ गया? यह केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक पौराणिक कथा छिपी है।
इस विस्तृत ब्लॉग में हम जानेंगे कि मलमास क्या है, खगोलीय और गणितीय दृष्टि से इसका क्या महत्व है, इसे ‘मल’ क्यों कहा गया, और सबसे महत्वपूर्ण—भगवान विष्णु ने कैसे एक तिरस्कृत और अशुद्ध माने जाने वाले मास को अपना नाम देकर उसे सभी मासों में सर्वश्रेष्ठ ‘पुरुषोत्तम मास’ बना दिया।
Table of Contents
Toggle1. मलमास (अधिक मास) क्या है? (गणितीय और खगोलीय दृष्टिकोण)
सनातन पंचांग मुख्य रूप से दो प्रकार की गणनाओं पर चलता है—सूर्य वर्ष (Solar Year) और चंद्र वर्ष (Lunar Year)। ‘सूर्य सिद्धांत’ और ‘वशिष्ठ सिद्धांत’ जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका बहुत सटीक वर्णन मिलता है।
- सूर्य वर्ष: पृथ्वी को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड का समय लगता है। यह एक सौर वर्ष कहलाता है।
- चंद्र वर्ष: चंद्रमा को पृथ्वी का चक्कर लगाने में जो समय लगता है, उसके आधार पर चंद्र वर्ष की गणना होती है। एक चंद्र मास 29.5 दिनों का होता है, जिससे एक चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन और 8 घंटे होते हैं।
इस प्रकार, एक सौर वर्ष और एक चंद्र वर्ष के बीच हर साल लगभग 10 दिन और 21 घंटे (लगभग 11 दिन) का अंतर आ जाता है। यह अंतर हर साल बढ़ता जाता है। तीन साल में यह अंतर लगभग 32 या 33 दिनों (यानी एक पूरे महीने) का हो जाता है।
यदि इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो हमारे त्योहार (जो चंद्र मास पर आधारित हैं) और ऋतुएँ (जो सूर्य पर आधारित हैं) आपस में बेमेल हो जाएंगे। उदाहरण के लिए, दीवाली जो सर्दियों की शुरुआत में आती है, कुछ वर्षों बाद गर्मियों में आने लगेगी।
इस भारी असंतुलन को दूर करने के लिए भारतीय खगोलशास्त्रियों ने हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घंटे के बाद चंद्र कैलेंडर में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया। इसी अतिरिक्त महीने को ‘अधिक मास’ (Extra Month) कहा जाता है।
2. अधिक मास को ‘मलमास’ क्यों कहा गया?
खगोलीय रूप से तो यह अधिक मास है, लेकिन इसे ‘मलमास’ क्यों कहा जाने लगा? इसके पीछे गहरा ज्योतिषीय कारण है।
भारतीय ज्योतिष में ‘संक्रांति’ का बहुत महत्व है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे ‘संक्रांति’ कहा जाता है (जैसे मकर संक्रांति)। एक वर्ष में 12 राशियां होती हैं और 12 ही संक्रांतियां होती हैं। प्रत्येक चंद्र मास में सामान्यतः एक सूर्य संक्रांति अवश्य पड़ती है, जो उस महीने को ऊर्जा प्रदान करती है।
लेकिन, जिस चंद्र मास में सूर्य की कोई भी संक्रांति नहीं होती (अर्थात पूरे महीने में सूर्य अपनी राशि नहीं बदलता), उस मास को ‘अधिक मास’ या ‘मलमास’ कहा जाता है।
सूर्य को आत्मा, ऊर्जा और जीवन का कारक माना गया है। सूर्य की गति और संक्रांति के बिना उस मास को ‘मलिन’, ‘निस्तेज’ या ‘अशुद्ध’ (मल) मान लिया गया। मान्यता बन गई कि जिस मास में सूर्य का गोचर नहीं है, उसमें सकारात्मक ऊर्जा का घोर अभाव होता है।
शुभ कार्यों पर रोक का कारण
इस मलिनता और ऊर्जा के अभाव के कारण हिंदू धर्मशास्त्रों में इस मास के दौरान सभी सकाम (सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले) और मांगलिक कार्यों पर रोक लगा दी गई। मलमास में निम्नलिखित कार्य पूर्णतः वर्जित माने गए:
- विवाह समारोह और सगाई
- मुंडन और उपनयन संस्कार
- नामकरण संस्कार
- गृह प्रवेश (नए घर में प्रवेश)
- नई संपत्ति, वाहन या आभूषण की खरीदारी
- नया व्यापार या उद्यम शुरू करना
चूंकि इस महीने में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होता था, इसलिए धीरे-धीरे समाज में इस मास को लेकर एक नकारात्मक धारणा बन गई। इसे अशुभ, अछूत और बेकार महीना माना जाने लगा।
3. पौराणिक कथा: मलमास की व्यथा और रुदन
पद्म पुराण में मलमास के पुरुषोत्तम मास बनने की बहुत ही सुंदर और भावुक कथा का वर्णन मिलता है। यह कथा केवल एक महीने की नहीं है, बल्कि यह संसार के हर उस जीव की कथा है जिसे समाज द्वारा तिरस्कृत और अपमानित किया जाता है।
कथा के अनुसार, हिंदू धर्म में हर मास, हर तिथि और हर प्रहर का एक स्वामी या अधिपति देवता होता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि सभी 12 महीनों के अपने-अपने स्वामी देवता हैं। लेकिन जब हर तीन साल में ‘अधिक मास’ प्रकट होता था, तो उसका कोई स्वामी नहीं था।
स्वामी विहीन होने के कारण, और ‘मलिन’ (अशुभ) माने जाने के कारण, कोई भी देवता इस मास का स्वामी बनने को तैयार नहीं था। सभी देवताओं, मनुष्यों और यहां तक कि अन्य 12 महीनों ने भी मलमास का घोर अपमान किया। उसे ‘अछूत’, ‘अशुभ’ और ‘मलिन’ कहकर पुकारा जाने लगा।
समाज और देवताओं के इस निरंतर तिरस्कार से मलमास को अत्यंत पीड़ा हुई। वह गहरे अवसाद और दुःख में डूब गया। उसे लगा कि उसके अस्तित्व का कोई अर्थ ही नहीं है। रोते और विलाप करते हुए, वह अपनी व्यथा लेकर देवर्षि नारद के पास पहुंचा। नारद जी ने मलमास की दयनीय स्थिति देखी और उसे भगवान श्री हरि विष्णु (वैकुंठनाथ) की शरण में जाने की सलाह दी।

4. वैकुंठ गमन: भगवान विष्णु के दरबार में मलमास
देवर्षि नारद के मार्गदर्शन पर, मलमास वैकुंठ लोक पहुंचा। वहां भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। मलमास भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।
भगवान विष्णु, जो करुणा के सागर हैं, उन्होंने मलमास को उठाया और अत्यंत प्रेम से पूछा, “हे वत्स! तुम इस प्रकार क्यों विलाप कर रहे हो? तुम्हारी क्या व्यथा है?”
मलमास ने हाथ जोड़कर और आंसुओं से भरी आंखों के साथ अपनी पीड़ा व्यक्त की: “हे प्रभु! मैं अधिपति विहीन हूँ। मेरा कोई नाथ नहीं है। इस संसार में हर मास का कोई न कोई देवता है, लेकिन मेरा कोई स्वामी नहीं। सूर्य के गोचर से विहीन होने के कारण संसार मुझे ‘मलमास’ कहता है। मुझे अशुद्ध और अशुभ माना जाता है। मेरे आते ही लोग सभी शुभ कर्म बंद कर देते हैं। देवताओं और मनुष्यों ने मुझे तिरस्कृत कर दिया है। हे नाथ! मैं इस अपमान के साथ और नहीं जीना चाहता। कृपया मुझे इस अस्तित्व से मुक्त करें या मुझे कोई ऐसा स्थान दें जहां मुझे भी सम्मान मिल सके।”
भगवान विष्णु ने मलमास की पीड़ा को गहराई से महसूस किया। उन्होंने कहा, “हे मलमास, तुम निराश न हो। जो कोई भी मेरी शरण में आता है, उसका दुःख मेरा दुःख बन जाता है। चलो, हम गोलोक चलते हैं, जहां भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु के पूर्ण अवतार) विराजमान हैं। वही तुम्हारी इस समस्या का स्थायी समाधान करेंगे।”
5. गोलोक में श्रीकृष्ण का महावरदान
भगवान विष्णु मलमास को लेकर गोलोक धाम पहुंचे। वहां भगवान श्रीकृष्ण राधारानी और गोपियों के साथ विराजमान थे। भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण को मलमास की व्यथा सुनाई और कहा कि इसे सभी ने त्याग दिया है, अब आप ही इसकी रक्षा करें।
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए मलमास को देखा। सनातन धर्म की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां जो सबसे दीन, हीन और तिरस्कृत होता है, ईश्वर उसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं।
श्रीकृष्ण ने मलमास को गले लगा लिया और एक ऐतिहासिक घोषणा की: “हे मलमास! आज से तुम अनाथ नहीं हो। तुमने मेरी शरण ली है, इसलिए आज से मैं स्वयं तुम्हारा स्वामी हूँ। मैं तुम्हें अपने सभी गुण, ऐश्वर्य, यश और नाम प्रदान करता हूँ। वेदों में मेरा एक नाम ‘पुरुषोत्तम’ है (अर्थात पुरुषों में सबसे उत्तम)। आज से यह संसार तुम्हें तुम्हारे मलिन नाम से नहीं, बल्कि मेरे नाम ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जानेगा।”
श्रेष्ठता का वरदान
श्रीकृष्ण ने केवल अपना नाम ही नहीं दिया, बल्कि उसे सभी 12 महीनों से श्रेष्ठ बना दिया। उन्होंने वरदान देते हुए कहा: “अन्य सभी महीनों में किए गए पुण्य कर्मों का फल सीमित होता है, लेकिन जो भी मनुष्य इस ‘पुरुषोत्तम मास’ में मेरी भक्ति, दान, जप और तप करेगा, उसे अन्य मासों की तुलना में हजार गुना अधिक पुण्य प्राप्त होगा। यह मास मुझे सबसे अधिक प्रिय होगा। जो व्यक्ति इस मास में निष्काम भाव से मेरी पूजा करेगा, वह सभी पापों से मुक्त होकर अंत में मेरे परम धाम (गोलोक) को प्राप्त करेगा।”
भगवान श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुनकर मलमास का सारा दुःख दूर हो गया। जो मास कल तक सबसे अशुद्ध माना जाता था, वह भगवान की कृपा से रातों-रात सबसे पवित्र और सर्वश्रेष्ठ ‘पुरुषोत्तम मास’ बन गया।
6. मलमास (पुरुषोत्तम मास) की विशेष एकादशियाँ
हर चंद्र मास में दो एकादशियाँ होती हैं। चूंकि मलमास एक अतिरिक्त महीना है, इसलिए इस महीने में आने वाली एकादशियों का महत्व अत्यंत विशेष हो जाता है। मलमास के दौरान दो अत्यंत पवित्र एकादशियाँ आती हैं:
- पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष): यह एकादशी मलमास के शुक्ल पक्ष में आती है। पुराणों के अनुसार, जो व्यक्ति पद्मिनी एकादशी का व्रत रखता है, उसे यज्ञ, तप और दान से मिलने वाले पुण्यों से भी अधिक फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत संतान प्राप्ति और मोक्ष के लिए उत्तम माना जाता है।
- परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष): मलमास के कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह एकादशी दरिद्रता का नाश करने वाली और परम सिद्धियां प्रदान करने वाली मानी गई है। कुबेर ने इसी एकादशी का व्रत करके धन के देवता का पद प्राप्त किया था।
7. पुरुषोत्तम मास में क्या करें? (विशेष नियम और अनुष्ठान)
चूंकि यह महीना सीधे भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को समर्पित है, इसलिए इस दौरान सात्विक जीवन शैली और भक्ति का विशेष महत्व है। यदि आप पुरुषोत्तम मास के परम पुण्यों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित कार्य अवश्य करें:
- श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय का पाठ: श्रीमद्भगवद्गीता का 15वां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” कहलाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं के ‘पुरुषोत्तम’ होने का रहस्य बताया है। मलमास में प्रतिदिन इसका पाठ करना आत्मज्ञान और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- दीप दान: किसी मंदिर, पवित्र नदी के किनारे या घर के तुलसी के पौधे के पास दीप जलाना (दीप दान) इस महीने में अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला माना गया है।
- मालपुआ और अन्न का दान: मलमास में 33 मालपुए (क्योंकि यह मास हर 33 महीने बाद आता है) कांसे के बर्तन में रखकर ब्राह्मणों को दान करने का विशेष विधान है। इसके अतिरिक्त गरीबों को अन्न और वस्त्र का दान महापुण्यदायी होता है।
- पवित्र नदियों में स्नान: इस मास में गंगा, यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा आदि में स्नान करना चाहिए। यदि संभव न हो, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर ‘हर गंगे’ का उच्चारण करते हुए स्नान करें।
- मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “हरे कृष्ण हरे कृष्ण…” महामंत्रों का जाप चलते-फिरते, उठते-बैठते निरंतर करना चाहिए।
- भागवत कथा का श्रवण: इस महीने में श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ करना या सुनना अत्यंत सौभाग्य की बात मानी जाती है।
8. वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
अगर हम मलमास के विधानों को मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो हमारे ऋषि-मुनियों की बुद्धिमत्ता स्पष्ट दिखाई देती है।
हर तीन साल में मनुष्य लगातार काम करते हुए, सांसारिक इच्छाओं के पीछे भागते हुए शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाता है। उसे एक ‘रीसेट’ (Reset) की जरूरत होती है। मलमास एक तरह से ‘आध्यात्मिक अवकाश’ (Spiritual Vacation) है।
चूंकि इस महीने में शादी-ब्याह, गृह प्रवेश और नई चीजों की खरीदारी पर रोक होती है, इसलिए मनुष्य पर सांसारिक खर्चे और सामाजिक दिखावे का कोई दबाव नहीं होता। इस बचे हुए समय और ऊर्जा को वह अपने भीतर (आत्म-निरीक्षण) और ईश्वर की ओर लगा सकता है। सात्विक भोजन शरीर को ‘डिटॉक्स’ (Detox) करता है और ध्यान व जप मन को ‘डिटॉक्स’ करता है।
9. निष्कर्ष: अशुद्धि से पूर्णता की ओर की यात्रा
मलमास से ‘पुरुषोत्तम मास’ बनने की यह यात्रा केवल पंचांग के कुछ पन्नों का बदलाव नहीं है। यह दर्शन है सनातन धर्म का, जो यह उद्घोष करता है कि इस ब्रह्मांड में कुछ भी ‘मलिन’ या ‘व्यर्थ’ नहीं है। जो वस्तु या जो जीव संसार द्वारा ठुकरा दिया जाता है, उसे परमात्मा अपने हृदय से लगा लेते हैं।
जब भी हर तीन वर्ष बाद यह पुरुषोत्तम मास आए, तो इसे अशुभ मानकर कोसने के बजाय, इसे भगवान का दिया हुआ एक अमूल्य अवसर मानें। यह वह ‘बोनस’ समय है जो सृष्टि ने हमें अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए दिया है।
जय श्री पुरुषोत्तम भगवान! जय श्री कृष्ण!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: मलमास कितने साल बाद आता है? मलमास (अधिक मास) हर 32 महीने, 16 दिन और 8 घटी के अंतराल पर, यानी लगभग हर 3 साल में एक बार आता है।
Q2: क्या मलमास में मृत्यु होने पर मोक्ष मिलता है? शास्त्रों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास में प्राण त्यागने वाले मनुष्य को सीधे भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक धाम की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
Q3: क्या मलमास में नया कपड़े पहन सकते हैं? मलमास में दैनिक उपयोग के लिए नए कपड़े पहने जा सकते हैं, लेकिन विवाह, त्योहार या किसी विशेष मांगलिक कार्य के लिए नए वस्त्रों या आभूषणों की खरीदारी से बचना चाहिए।
Q4: मलमास में कौन से भगवान की पूजा की जाती है? मलमास मुख्य रूप से भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस दौरान शालिग्राम भगवान की पूजा भी विशेष फलदायी होती है।
Q5: क्या मलमास में घर का निर्माण जारी रख सकते हैं? हाँ, जो कार्य मलमास शुरू होने से पहले से चल रहे हैं (जैसे घर का निर्माण, व्यापार का संचालन), उन्हें रोका नहीं जाता। केवल नई नींव रखना या नया कार्य आरंभ करना वर्जित है।
दुर्लभ दर्शन — घर बैठे दिव्य आध्यात्मिक अनुभव
मंदिरों, आरती और भक्ति का आध्यात्मिक अनुभव घर बैठे प्राप्त करें। दुर्लभ दर्शन के माध्यम से 3D VR दर्शन, दिव्य पूजा और पौराणिक कथाएं एक नए रूप में अनुभव की जा सकती हैं।
अधिक जानकारी के लिए:






