अधिकमास की पूर्णिमा
Table of Contents
Toggleअधिकमास की पूर्णिमा: आध्यात्मिक चेतना, वैज्ञानिक रहस्य और महापुण्य का पावन पर्व
सनातन धर्म में समय की गणना केवल कैलेंडर बदलने का साधन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड, प्रकृति और मानव चेतना के बीच के गहरे संबंध को समझने का विज्ञान है। हिंदू पंचांग में हर तिथि और मास का अपना एक विशेष महत्व होता है, लेकिन जब बात ‘अधिकमास’ (जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है) की आती है, तो इसका आध्यात्मिक मूल्य अनंत गुना बढ़ जाता है।
इस अत्यंत पवित्र महीने में आने वाली पूर्णिमा को सनातन परंपरा में एक दिव्य और दुर्लभ अवसर माना गया है। यह वह समय होता है जब लौकिक और पारलौकिक ऊर्जाएं अपने चरम पर होती हैं। आइए, अधिकमास की पूर्णिमा के इस पावन विषय पर गहराई से चर्चा करें और समझें कि क्यों यह तिथि हर श्रद्धालु के लिए मोक्ष और समृद्धि का द्वार खोलती है।
1. अधिकमास क्या है? (वैज्ञानिक और ज्योतिषीय आधार)
अधिकमास की पूर्णिमा के महत्व को समझने से पहले यह समझना आवश्यक है कि अधिकमास क्या है और यह क्यों अस्तित्व में आता है। इसके पीछे एक गहरा खगोलीय और गणितीय विज्ञान है।
हिंदू पंचांग मुख्य रूप से दो गणनाओं पर आधारित होता है:
- सौर मास (Solar Calendar): सूर्य की गति पर आधारित, जो लगभग 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड का होता है।
- चंद्र मास (Lunar Calendar): चंद्रमा की कलाओं पर आधारित, जो लगभग 354 दिनों का होता है।
गणितीय अंतर: सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच प्रतिवर्ष लगभग $11$ दिनों का अंतर आता है। यदि इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो हमारे त्योहार और ऋतुएं आपस में पूरी तरह से बेमेल हो जाएंगे (जैसे दिवाली गर्मियों में और होली कड़ाके की ठंड में आने लगेगी)।
इस अंतर को पाटने के लिए और चंद्र वर्ष को सौर वर्ष के साथ संरेखित (Align) करने के लिए, हर ३२ महीने, १६ दिन और ४ घड़ियों के बाद पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी अतिरिक्त महीने को ‘अधिकमास’ कहा जाता है।
चूंकि यह महीना पूरी तरह से ईश्वर आराधना के लिए समर्पित होता है और इसमें सूर्य की संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, इसलिए इसे लौकिक कार्यों के लिए ‘मलमास’ और आध्यात्मिक कार्यों के लिए ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। इस दिव्य मास का समापन जिस पूर्णता के दिन होता है, वही अधिकमास की पूर्णिमा कहलाती है।
2. ‘पुरुषोत्तम मास’ और पूर्णिमा की पौराणिक कथा
अधिकमास को ‘पुरुषोत्तम मास’ बनने की कथा बड़ी ही रोचक और संदेशपरक है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ऋषियों ने इस अतिरिक्त महीने की गणना की, तो इसमें सूर्य संक्रांति न होने के कारण इसे ‘मलमास’ (अपवित्र या अशुद्ध महीना) कह दिया गया। इस मास के दौरान नामकरण, विवाह, जनेऊ या गृह प्रवेश जैसे कोई भी मांगलिक कार्य वर्जित कर दिए गए।
इस उपेक्षा से दुखी होकर मलमास साक्षात रूप धारण कर भगवान विष्णु के पास वैकुंठ धाम पहुंचा और रोते हुए बोला—“हे प्रभु! संसार में हर जीव, हर तिथि और हर मास का कोई न कोई स्वामी है, लेकिन मेरा कोई स्वामी नहीं है। सब मुझे अशुद्ध और अभागा कहकर दुत्कारते हैं। ऐसे जीवन का क्या लाभ?”
मलमास की व्यथा सुनकर दयानिधान भगवान विष्णु उसे लेकर गोलोक गए, जहां भगवान श्रीकृष्ण विराजमान थे। श्रीकृष्ण ने मलमास की पीड़ा को समझा और उसे एक अद्भुत वरदान दिया:
“अब से मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ। आज से तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जाने जाओगे। जो गुण मुझमें हैं, वे सब तुममें समाहित होंगे। इस संसार में जो भी मनुष्य इस महीने में जप, तप, दान और पूजा करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में करोड़ों गुना अधिक फल प्राप्त होगा। मैं इस मास का स्वामी बनता हूँ।”
इस प्रकार, जो महीना कभी तिरस्कृत था, वह भगवान के वरदान से सभी महीनों में सर्वश्रेष्ठ बन गया। और इस सर्वश्रेष्ठ महीने की पूर्णिमा वह अंतिम और सबसे शक्तिशाली दिन होती है, जब पूरे महीने की गई साधना का पूर्ण फल भक्त की झोली में गिरता है।
3. अधिकमास की पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व
सनातन संस्कृति में पूर्णिमा की तिथि को वैसे भी पूर्णता, मानसिक शांति और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। चंद्रमा इस दिन अपनी सभी १६ कलाओं से पूर्ण होता है। लेकिन अधिकमास की पूर्णिमा का महत्व निम्नलिखित कारणों से और भी विशिष्ट हो जाता है:
अ) श्रीहरि और महालक्ष्मी की संयुक्त कृपा
यह दिन भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) और माता लक्ष्मी की आराधना का महायोग है। पूर्णिमा की धवल चांदनी में जब भगवान विष्णु का केशर-दूध से अभिषेक किया जाता है, तो जातक के जीवन से दरिद्रता का समूल नाश हो जाता है।
ब) संचित पापों का क्षय
शास्त्रों में कहा गया है कि जाने-अनजाने में मनुष्य से जो भी पाप कर्म होते हैं, वे उसकी आत्मा पर एक भारी बोझ की तरह जमा हो जाते हैं। अधिकमास की पूर्णिमा को पवित्र नदियों में स्नान करने और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप भस्म हो जाते हैं।
स) मानसिक शांति और अवसाद से मुक्ति
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को ‘मन का कारक’ ($मनसो\ जातश्चक्षोः\ सूर्यो\ अजायत$) माना गया है। अधिकमास में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्तर बदला हुआ होता है। इस दिन पूर्णिमा के चंद्रमा को अर्घ्य देने और उसकी रोशनी में बैठने से मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) और अनिद्रा जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
4. इस पावन दिन के मुख्य धार्मिक कृत्य और पूजा विधि
अधिकमास की पूर्णिमा के दिन किए जाने वाले अनुष्ठानों का फल अक्षय होता है। यदि आप इस दिन का पूर्ण लाभ उठाना चाहते हैं, तो निम्नलिखित पूजा विधि का पालन कर सकते हैं:
१. ब्रह्ममुहूर्त स्नान
इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा) में स्नान करने का विधान है। यदि नदी पर जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय वरुण देव और नारायण का ध्यान करें।
२. व्रत का संकल्प
स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले वस्त्र) धारण करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
३. सत्यनारायण भगवान की कथा
अधिकमास की पूर्णिमा को भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना या पढ़ना अत्यंत फलदायी माना गया है।
- पूजा स्थान पर एक चौकी स्थापित करें और उस पर पीला कपड़ा बिछाएं।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- उन्हें पीले फूल, पीले फल, तुलसी दल, पंचामृत और पंजीरी का भोग लगाएं।
- पूरी श्रद्धा के साथ सत्यनारायण की कथा सुनें और अंत में आरती करें।
४. दीपदान का विशेष महत्व
इस दिन शाम के समय घर के मुख्य द्वार, तुलसी के पौधे के पास और किसी मंदिर या नदी के किनारे दीपदान अवश्य करना चाहिए। अधिकमास में दीपदान करने से जीवन का अंधकार मिटता है और ज्ञान का प्रकाश होता है।
५. चंद्र देव की पूजा
रात को जब पूर्ण चंद्रमा उदित हो, तो चांदी के पात्र में दूध, जल, अक्षत और सफेद फूल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्र देव से प्रार्थना करें कि वे आपके मन को शीतलता और बुद्धि को प्रखरता प्रदान करें।

5. दान की महिमा: अधिकमास पूर्णिमा का महामंत्र
“ददाति इति दानम्” — जो बिना किसी स्वार्थ या बदले की भावना के दिया जाए, वही दान है।
अधिकमास की पूर्णिमा पर दान का महत्व सामान्य दिनों से हजार गुना अधिक होता है। इस दिन विशेष रूप से ‘मालपुआ’ दान करने की एक प्राचीन और अनूठी परंपरा है।
| दान की वस्तु | धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व |
|---|---|
| कांस्य पात्र में ३३ मालपुए | यह अधिकमास का सबसे बड़ा दान माना जाता है। ३३ मालपुए ब्रह्मांड के ३३ कोटि देवी-देवताओं के प्रतीक माने जाते हैं। इन्हें कांसे के बर्तन में रखकर दान करने से पितृ दोष और ग्रहों के बुरे प्रभाव शांत होते हैं। |
| पीले अन्न व वस्त्र | चना दाल, केला, केसरिया चावल और पीले वस्त्रों का दान करने से बृहस्पति (गुरु) ग्रह मजबूत होता है, जिससे शिक्षा और करियर में सफलता मिलती है। |
| दीप और घी का दान | किसी ब्राह्मण को या मंदिर में शुद्ध घी और मिट्टी या तांबे के दीपक का दान करने से आंखों की रोशनी अच्छी होती है और समाज में यश बढ़ता है। |
| जल और छाता | यदि अधिकमास गर्मियों के मौसम में हो, तो राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाना या छाते का दान करना मोक्ष दायक माना गया है। |
6. ज्योतिषीय दृष्टिकोण: कुंडली के दोषों का निवारण
नवग्रहों की शांति और कुंडली के विभिन्न दोषों से मुक्ति पाने के लिए अधिकमास की पूर्णिमा एक ‘गोल्डन चांस’ की तरह होती है।
* पितृ दोष से मुक्ति
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है, जिसके कारण परिवार में बीमारियां, धन की कमी या संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, तो अधिकमास की पूर्णिमा को पितरों के निमित्त तर्पण करना चाहिए। इस दिन किया गया तर्पण पितरों को सीधे तृप्ति प्रदान करता है और वे प्रसन्न होकर वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
* कालसर्प दोष और राहु-केतु की शांति
पूर्णिमा के स्वामी स्वयं चंद्र देव हैं और अधिकमास के स्वामी विष्णु हैं। इस दिन शिवजी का जलाभिषेक करने और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से कालसर्प दोष के नकारात्मक प्रभावों में भारी कमी आती है।
* बृहस्पति (गुरु) ग्रह का बल
चूंकि इस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है और नारायण का रंग पीला है, इसलिए यह दिन गुरु ग्रह को बलवान करने के लिए सबसे उत्तम है। जिन कन्याओं के विवाह में देरी हो रही हो, वे यदि इस दिन का व्रत रखें, तो उन्हें सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।
7. अधिकमास पूर्णिमा पर क्या करें और क्या न करें?
इस पवित्र तिथि की ऊर्जा का सही उपयोग करने के लिए हमें कुछ नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए:
क्या करें
- तुलसी पूजा: इस दिन तुलसी के पौधे में कच्चा दूध मिश्रित जल अर्पित करें और परिक्रमा करें। याद रखें कि पूर्णिमा के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसलिए पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले ही तोड़ लें।
- मौन साधना: यदि संभव हो, तो दिन का कुछ समय मौन रहकर बिताएं। मौन रहने से आंतरिक ऊर्जा का ह्रास नहीं होता।
- मंत्र जाप: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ महामंत्र का निरंतर मानसिक जाप करें।
क्या न करें
- तामसिक भोजन से दूरी: इस दिन भूलकर भी मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज या किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन न करें।
- कलह और क्रोध का त्याग: पूर्णिमा के दिन घर में अशांति या झगड़ा होने से लक्ष्मी जी रुष्ट हो जाती हैं। अपनी वाणी पर संयम रखें।
- किसी का अपमान न करें: घर के बुजुर्गों, महिलाओं या किसी लाचार व्यक्ति का उपहास न उड़ाएं और न ही उन्हें खाली हाथ लौटाएं।
8. वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलू
सनातन धर्म की कोई भी परंपरा अंधविश्वास पर आधारित नहीं है; उसके पीछे गहरा विज्ञान छुपा है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, जिससे उसका गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) चरम पर होता है। इसी कारण समुद्र में ऊंचे ज्वार-भाटे (Tides) आते हैं। चूंकि मानव शरीर में भी लगभग $70\%$ जल होता है, इसलिए चंद्रमा का यह गुरुत्वाकर्षण हमारे मस्तिष्क और भावनाओं को भी गहराई से प्रभावित करता है।
जिन लोगों का मानसिक संतुलन थोड़ा कमजोर होता है, वे पूर्णिमा के आसपास अधिक भावुक या उग्र महसूस करते हैं। अधिकमास की पूर्णिमा पर जब हम उपवास रखते हैं, सात्विक भोजन करते हैं और ध्यान लगाते हैं, तो:
- शरीर का विषहरण होता है: उपवास रखने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर के टॉक्सिंस बाहर निकल जाते हैं।
- भावनाओं पर नियंत्रण: मंत्र जाप और ध्यान मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को शांत करते हैं, जिससे चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण होने वाले मूड स्विंग्स नियंत्रित रहते हैं।
9. जीवन बदलने वाला एक दुर्लभ अवसर
अधिकमास की पूर्णिमा कोई सामान्य कैलेंडर तिथि नहीं है; यह ब्रह्मांड द्वारा हमें दिया गया एक ‘रीसेट बटन’ (Reset Button) है। यह हमारे व्यस्त और भौतिकता से भरे जीवन में कुछ पल रुककर, अपनी आत्मा की गहराइयों में झांकने और परमात्मा से जुड़ने का आमंत्रण है।
चाहे आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे हों, मानसिक अशांति का सामना कर रहे हों, या केवल अपनी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हों—अधिकमास की पूर्णिमा की रात को श्रद्धापूर्वक की गई प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती।
इस पावन पर्व पर केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की शांति और कल्याण के लिए प्रार्थना करें। भगवान पुरुषोत्तम और माता लक्ष्मी की कृपा आप सभी पर बनी रहे।
॥ नमो नारायण ॥
दुर्लभ दर्शन — घर बैठे दिव्य आध्यात्मिक अनुभव
मंदिरों, आरती और भक्ति का आध्यात्मिक अनुभव घर बैठे प्राप्त करें। दुर्लभ दर्शन के माध्यम से 3D VR दर्शन, दिव्य पूजा और पौराणिक कथाएं एक नए रूप में अनुभव की जा सकती हैं |
अधिक जानकारी के लिए:







