ओंकारिया अष्टमी: भगवान शिव की पूजा और महत्व

ओंकारिया अष्टमी पर देवी दुर्गा का सुंदर शृंगार, जलती दीपों की रोशनी और फूलों की सुगंध में पूजा का दृश्य

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ओंकारिया अष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाने वाली एक पवित्र व्रत परंपरा है जो विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना से जुड़ी हुई है। यह व्रत कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक एक दिन बाद आता है और इसे मनाने से भक्तों को मनोकामनाएं पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलता है।

ओंकारिया अष्टमी क्या है?

ओंकारिया अष्टमी एक प्राचीन हिन्दू व्रत है जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन भक्तगण व्रत रखते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेल पत्र और धतूरा चढ़ाते हैं। यह व्रत विशेष रूप से उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।

परंपरा के अनुसार, इस दिन भोलेनाथ की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। व्रत रखने वाले भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और संध्या के समय पूजन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।

ओंकारिया अष्टमी का धार्मिक महत्व

ओंकारिया अष्टमी का सनातन धर्म में विशेष स्थान है। ‘ओंकार’ शब्द ‘ॐ’ से जुड़ा है जो सृष्टि का मूल मंत्र माना जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है जो ओंकार स्वरूप हैं।

इस व्रत को करने से भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है और मन में शांति का अनुभव होता है। मान्यता है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को करते हैं, उनके जीवन में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं।

ओंकारिया अष्टमी की पूजा विधि

व्रत की सफलता के लिए सही विधि से पूजा करना आवश्यक है। यहां पूजा की सामान्य विधि दी गई है:

प्रातःकाल की तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करके शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें।

पूजन सामग्री: बेल पत्र, धतूरा, आक के फूल, दूध, दही, शहद, घी, शक्कर (पंचामृत के लिए), गंगाजल, अक्षत, फल, धूप-दीप और नैवेद्य की व्यवस्था करें।

पूजा प्रक्रिया: सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें। फिर शिवलिंग को जल और दूध से स्नान कराएं। पंचामृत से अभिषेक करें और बेल पत्र चढ़ाते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें।

व्रत का संकल्प: पूजा के समय मन में संकल्प लें कि आप यह व्रत पूर्ण श्रद्धा से कर रहे हैं और भगवान शिव से परिवार की मंगलकामना करें।

ओंकारिया अष्टमी पर विशेष नियम

इस व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए। व्रती को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए और केवल जल ग्रहण करना चाहिए। कुछ भक्त फलाहार भी करते हैं।

व्रत के दिन सात्विक विचार रखें और किसी से कटु वचन न बोलें। क्रोध, लोभ और मोह से दूर रहें। शिव भक्ति में मन को लगाएं और रुद्राष्टकम् या शिव चालीसा का पाठ करें।

संध्या काल में पूजा के बाद ही भोजन ग्रहण करें। भोजन में सात्विक पदार्थ लें और तामसिक भोजन से पूरी तरह बचें।

ओंकारिया अष्टमी के लाभ

परंपरा के अनुसार, ओंकारिया अष्टमी का व्रत करने से अनेक लाभ मिलते हैं। इस व्रत से मन की शुद्धि होती है और आत्मिक शांति मिलती है।

जो भक्त नियमित रूप से यह व्रत करते हैं, उनके जीवन में स्थिरता आती है। परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।

विशेष रूप से जो भक्त संतान सुख की कामना करते हैं या किसी मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए। भोलेनाथ अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा देखकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओंकारिया अष्टमी कब आती है?

ओंकारिया अष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। यह कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन आती है और हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार इसकी तिथि बदलती रहती है।

इस व्रत में क्या खाना चाहिए?

व्रत के दिन निराहार रहना उत्तम है, लेकिन यदि आवश्यक हो तो फलाहार किया जा सकता है। फल, दूध, दही और साबूदाना जैसे सात्विक पदार्थ ले सकते हैं। संध्या पूजन के बाद सामान्य सात्विक भोजन करें।

ओंकारिया अष्टमी की पूजा में कौन से मंत्र बोलने चाहिए?

इस व्रत में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप सबसे शुभ माना जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र, रुद्राष्टकम् और शिव चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं। जो भक्त इन मंत्रों को नहीं जानते, वे केवल शुद्ध मन से ‘हर हर महादेव’ का जाप कर सकते हैं।

क्या इस व्रत को महिलाएं भी रख सकती हैं?

हां, ओंकारिया अष्टमी का व्रत स्त्री-पुरुष दोनों रख सकते हैं। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं। इस व्रत में कोई वर्जना नहीं है और सभी श्रद्धालु इसे कर सकते हैं।

ओंकारिया अष्टमी और कृष्ण जन्माष्टमी में क्या अंतर है?

कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है जबकि ओंकारिया अष्टमी भगवान शिव को समर्पित व्रत है। दोनों अलग-अलग पूजा विधि और महत्व रखते हैं, लेकिन दोनों ही भक्ति और आध्यात्मिकता से जुड़े पर्व हैं।

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