अधिकमास का महत्त्व और क्यों इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है | The Significance of Adhik Maas and Why It Is Called Purushottam Maas 2026

अधिकमास

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अधिकमास का महत्त्व और क्यों इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है

हिंदू पंचांग में महीनों की गणना चंद्रमा के आधार पर की जाती है। इस पंचांग के अनुसार, एक वर्ष में सामान्यतः बारह महीने होते हैं, जिनमें प्रत्येक महीने की लंबाई 29.5 से 30 दिन के बीच होती है। हालांकि, हर कुछ वर्षों में एक ऐसा महीना आता है, जिसे ‘अधिकमास’ कहा जाता है। इस महीने का समावेश पंचांग में एक अतिरिक्त मास के रूप में होता है, जो संपूर्ण वर्ष की गणना के लिए आवश्यक होता है। इस महीने का विशेष नाम ‘पुरुषोत्तम मास’ भी है, जो एक धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

आइए इस लेख में हम अधिकमास के महत्त्व, इसे पुरुषोत्तम मास कहे जाने के कारण, और इस दौरान किये जाने वाले धार्मिक कार्यों के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

अधिकमास क्या है?

अधिकमास, जिसे मालमास भी कहा जाता है, वह अतिरिक्त महीना होता है, जो हर 2.5 साल के बाद हिंदू पंचांग में आता है। इसे एक “अतिरिक्त” या “अवधि से बाहर” महीना माना जाता है, जिसे एक सामान्य महीने के रूप में शामिल नहीं किया जाता है। इस महीने में चंद्रमा की पूर्णता और अमावस्या के बीच की अवधि से एक अतिरिक्त महीने की उपस्थिति होती है।

पंचांग की गणना के अनुसार, साल में 12 महीने होते हैं, लेकिन इस अतिरिक्त महीने के कारण, इस वर्ष में कुल 13 महीने होते हैं। इस कारण यह महीना ‘अधिकमास’ के नाम से प्रसिद्ध है।

अधिकमास को धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह समय देवताओं के लिए एक विशेष अवसर होता है, जब वे अपनी कृपा और आशीर्वाद भक्तों पर विशेष रूप से बरसाते हैं। इस समय का उपयोग पूजा, व्रत, ध्यान और साधना के लिए किया जाता है।

अधिकमास का महत्त्व

अधिकमास के महत्व को समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि हिंदू धर्म में समय का महत्व और पंचांग की व्यवस्था कितनी सटीक और वैज्ञानिक है। समय के चक्र को बनाए रखने के लिए, चंद्रमास में हर कुछ वर्षों में अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, ताकि पंचांग की गणना सटीक रहे।

यह महीना विशेष रूप से भक्तों के लिए एक अवसर होता है, जिससे वे अपना आत्मशुद्धिकरण कर सकते हैं, पुण्य अर्जित कर सकते हैं और भगवान के साथ गहरी आत्मीयता स्थापित कर सकते हैं।

आध्यात्मिक लाभ

इस महीने में विशेष रूप से तपस्या, पूजा और साधना करने से आत्मा की शुद्धि होती है। अधिकमास में भक्त विशेष रूप से भगवान विष्णु, भगवान श्री कृष्ण, और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इसका उद्देश्य न केवल धार्मिक कर्तव्यों को निभाना है बल्कि मानसिक शांति, सुख, समृद्धि और एकाग्रता प्राप्त करना भी है।

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पुण्य अर्जन

मान्यता है कि अधिकमास के दौरान किए गए व्रत और पूजा विशेष पुण्य प्रदान करते हैं। खासतौर पर तुलसी पूजा, भगवान विष्णु की पूजा और कृष्ण मंत्रों का जाप करने से मनुष्य के जीवन से सभी कष्ट और दुख दूर होते हैं। इससे भगवान की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के पाप समाप्त होते हैं।

धार्मिक अनुष्ठान

अधिकमास का समय विशेष धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे श्री कृष्ण व्रत, राम व्रत और महालक्ष्मी पूजा के लिए उपयुक्त होता है। लोग इस समय विशेष रूप से पवित्र जल, फल, और खाद्य सामग्री का दान करते हैं, जिससे वे अधिक पुण्य अर्जित करते हैं और अगले जन्म में शुभ फल प्राप्त करते हैं।

पुरुषोत्तम मास का नामकरण क्यों हुआ?

अधिकमास को ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है, और इसके पीछे एक दिलचस्प कथा है। भारतीय धार्मिक कथाओं और पुराणों के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था। इस दौरान असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया, और भगवान विष्णु को इस युद्ध के दौरान एक विशेष कार्य सौंपा। भगवान विष्णु ने इस कार्य के अंतर्गत यह मास (अधिकमास) पृथ्वी पर भेजा, ताकि भक्त इस महीने को श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करें और भगवान के चरणों में समर्पित हो जाएं।

भगवान विष्णु ने इस विशेष मास को ‘पुरुषोत्तम’ यानी ‘सर्वश्रेष्ठ पुरुष’ के रूप में मान्यता दी, क्योंकि यह मास अपने आप में एक अत्यधिक पुण्यकारी और दिव्य समय होता है। इसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है।

इस मास में विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण और भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए, क्योंकि इस दौरान उनकी कृपा विशेष रूप से भक्तों पर बरसती है। इस मास में भगवान श्री कृष्ण के 108 नामों का जप करना, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण करना भक्तों के लिए विशेष लाभकारी होता है।

अधिकमास में क्या करना चाहिए?

अधिकमास के दौरान कुछ विशेष कार्य और व्रत होते हैं जिन्हें भक्तों को करना चाहिए:

  1. व्रत और उपवास

इस मास में भक्त विशेष व्रत रखते हैं, जैसे राम व्रत और कृष्ण व्रत। उपवास रखने से शुद्धता और मानसिक संतुलन में वृद्धि होती है।

  1. पूजा और ध्यान

इस माह में विशेष रूप से भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। उनकी आराधना करने से जीवन में शांति और सकारात्मकता आती है। भक्तों को इस मास में विशेष रूप से “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना चाहिए।

  1. दान और सेवा

अधिकमास में दान और सेवा का विशेष महत्व है। इस महीने में गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, और धन दान करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है।

  1. तुलसी पूजा

तुलसी के पौधे की पूजा इस मास में विशेष रूप से करनी चाहिए, क्योंकि तुलसी को भगवान विष्णु की प्रियता प्राप्त है। तुलसी के पौधे को जल अर्पित करना और उसकी पूजा करना बहुत फलदायी माना जाता है।

अधिकमास में कुछ विशेष व्रत और अनुष्ठान

  1. भगवान श्री कृष्ण व्रत

इस मास में भक्त विशेष रूप से श्री कृष्ण का व्रत करते हैं। श्री कृष्ण के आठ प्रमुख दिव्य रूपों की पूजा करके भक्त भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस व्रत में 108 बार श्री कृष्ण के नामों का जप और 16 प्रमुख नामों का ध्यान किया जाता है।

  1. गोवर्धन पूजा

अधिकमास में गोवर्धन पूजा का भी आयोजन किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से गोवर्धन पर्वत और भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है।

  1. लक्ष्मी पूजा

इस माह में लक्ष्मी पूजा का भी आयोजन होता है, क्योंकि भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता का संबंध अटूट होता है। इस पूजा से घर में समृद्धि और सुख-शांति आती है।

अधिकमास के दौरान कौन-कौन सी चीजों से बचना चाहिए?

अधिकमास के दौरान कुछ चीजों से बचने की सलाह दी जाती है:

मांसाहार: इस मास में मांसाहार और शराब से पूरी तरह से बचना चाहिए।
झगड़ा और विवाद: इस महीने में किसी से भी वाद-विवाद या झगड़ा नहीं करना चाहिए।
नशा: नशे से दूर रहना चाहिए, क्योंकि यह मानसिक शांति में विघ्न डालता है।
अशुद्धता: इस मास में शुद्धता का पालन करना जरूरी है।
निष्कर्ष

अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है, हिंदू पंचांग का एक अत्यधिक पुण्यकारी और विशेष महीना है। यह मास हमें आत्मशुद्धि, तपस्या, और भक्ति के मार्ग पर चलने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है। इस समय भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की पूजा, व्रत, दान, और सेवा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।

इस मास में जितनी श्रद्धा और भक्ति से पूजा की जाए, उतना अधिक भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। और इस मास के माध्यम से हम अपने पापों का नाश करके, भगवान के आशीर्वाद से जीवन को सफल और पूर्ण बना सकते हैं।

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